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अम्बेडकर अस्पताल ने रचा नया कीर्तिमान, 20 दिन में 9 फेफड़ों की जटिल सर्जरी सफल

दो महीनों में 13 लोबेक्टॉमी, खून की उल्टी से जूझ रहे दो मरीजों की इमरजेंसी सर्जरी कर बचाई जान

www.healthbhaskar.com/ रायपुर 11 अगस्त 2026. पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय के हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग ने फेफड़ों की जटिल सर्जरी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विभाग ने सिर्फ 20 दिनों में 9 लोबेक्टॉमी सर्जरी सफलतापूर्वक की हैं। पिछले दो महीनों में यह संख्या बढ़कर 13 लोबेक्टॉमी हो गई है।

इनमें दो मरीज ऐसे थे, जिन्हें खांसी के साथ अत्यधिक रक्तस्राव यानी हेमोप्टाइसिस हो रहा था। दोनों की आपातकालीन सर्जरी कर उनकी जान बचाई गई। अत्याधुनिक तकनीक और एडवांस्ड लंग स्टेपलर की मदद से की गई इन सर्जरियों को अस्पताल ने फेफड़ों की सर्जरी के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि बताया है।

क्या है लोबेक्टॉमी?

लोबेक्टॉमी में बीमारी से प्रभावित फेफड़े के एक हिस्से यानी लोब को ऑपरेशन के जरिए निकाल दिया जाता है। दाएं फेफड़े में तीन और बाएं फेफड़े में दो लोब होते हैं। जब एस्परजिलोमा, ब्रोन्किएक्टैसिस या लंग ट्यूमर जैसी बीमारी फेफड़े के किसी एक लोब तक सीमित रहती है, तब संक्रमित या प्रभावित हिस्से को निकालने के लिए लोबेक्टॉमी की जाती है।

विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के अनुसार, यह अत्यंत जटिल सर्जरी है। अस्पताल में आधुनिक लंग स्टेपलर तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे ऑपरेशन के बाद होने वाली ब्रोंकोप्लूरल फिस्टुला जैसी जटिलताओं का खतरा काफी कम हो जाता है।

टीबी के बाद होने वाली बीमारी भी प्रमुख कारण

छत्तीसगढ़ में फेफड़ों की लोबेक्टॉमी के प्रमुख कारणों में एस्परजिलोमा और ब्रोन्किएक्टैसिस शामिल हैं। एस्परजिलोमा एक फंगल संक्रमण है, जो विशेष रूप से ऐसे मरीजों में हो सकता है, जिनके फेफड़े पहले टीबी से प्रभावित रहे हों या जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो।

ब्रोन्किएक्टैसिस में फेफड़ों के अंदर क्षतिग्रस्त हिस्से और गुहाएं बन सकती हैं, जिसके कारण मरीज को लगातार खांसी और कई बार खांसी के साथ खून आने की समस्या होती है। इसके अलावा लंग एब्सिस, वैस्कुलर मालफॉर्मेशन और फेफड़ों का कैंसर भी खून आने के प्रमुख कारण हो सकते हैं।

साल में 15-20 लोबेक्टॉमी, पड़ोसी राज्यों से भी पहुंचते हैं मरीज

अस्पताल के अनुसार, यहां सामान्यतः एक वर्ष में 15 से 20 लोबेक्टॉमी सर्जरी होती हैं। इसके अलावा डिकॉर्टिकेशन, सेगमेंटेक्टॉमी और न्यूमोनेक्टॉमी जैसी जटिल फेफड़ों की सर्जरी भी की जाती हैं। फेफड़े की सर्जरी के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश से भी मरीज यहां पहुंचते हैं।

इन सभी सर्जरियों को आयुष्मान योजना के तहत निशुल्क किए जाने की जानकारी अस्पताल ने दी है। वर्तमान में भी विभाग में लोबेक्टॉमी के लिए कुछ मरीज प्रतीक्षारत हैं।

ऑपरेशन के बाद 6-8 दिन में डिस्चार्ज

लोबेक्टॉमी के दौरान छाती में चीरा लगाकर प्रभावित फेफड़े के हिस्से को स्वस्थ हिस्से से अलग किया जाता है। इसके बाद विशेष तकनीक और लंग स्टेपलर की सहायता से संक्रमित लोब को बाहर निकाला जाता है। आधुनिक स्टेपलर के इस्तेमाल से ऑपरेशन के बाद होने वाली जटिलताओं की संभावना कम होती है। सामान्य परिस्थितियों में मरीज को 6 से 8 दिन बाद अस्पताल से छुट्टी दी जा सकती है।

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