ADHD और एंग्जायटी में क्या है अंतर? समान लक्षणों के कारण अक्सर हो जाती है गलत पहचान
आजकल ध्यान न लगना, बार-बार बेचैनी महसूस होना और काम पर फोकस न कर पाना जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे लक्षण ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) और एंग्जायटी डिसऑर्डर दोनों में दिखाई दे सकते हैं। यही वजह है कि कई लोग इन दोनों स्थितियों को एक जैसा समझ लेते हैं। हालांकि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों की वजह, पहचान और उपचार पूरी तरह अलग हैं, इसलिए सही समय पर सही निदान बेहद जरूरी है।
ध्यान की समस्या, लेकिन वजह अलग-अलग
विशेषज्ञों के अनुसार ADHD एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जिसमें मस्तिष्क का वह हिस्सा प्रभावित होता है जो ध्यान, व्यवहार नियंत्रण और कार्यों की योजना बनाने से जुड़ा होता है। इसके लक्षण आमतौर पर बचपन में शुरू होते हैं और कई मामलों में वयस्क होने तक बने रहते हैं।
वहीं एंग्जायटी डिसऑर्डर एक मानसिक स्वास्थ्य विकार है, जिसमें व्यक्ति अत्यधिक चिंता, डर और नकारात्मक विचारों के कारण एकाग्रता खो देता है। ऐसे में व्यक्ति का ध्यान काम से ज्यादा अपनी चिंताओं पर केंद्रित रहता है।
गलत पहचान से बढ़ सकती है समस्या
विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों स्थितियों में ध्यान भटकना, बेचैनी, काम पूरा करने में कठिनाई और रोजमर्रा के कार्यों पर असर जैसे लक्षण समान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति मीटिंग में ध्यान नहीं दे पा रहा है, तो ADHD में उसका ध्यान स्वाभाविक रूप से भटक सकता है, जबकि एंग्जायटी में उसका मन लगातार चिंता और नकारात्मक विचारों में उलझा रहता है।
यही समानता कई बार गलत पहचान और गलत इलाज का कारण बन जाती है।
दोनों समस्याएं एक साथ भी हो सकती हैं
विशेषज्ञों के मुताबिक कई लोगों में ADHD और एंग्जायटी डिसऑर्डर दोनों एक साथ भी पाए जाते हैं। इसे कोमॉर्बिडिटी (Comorbidity) कहा जाता है। शोध बताते हैं कि ADHD से पीड़ित कई वयस्कों और बच्चों में किसी न किसी प्रकार की एंग्जायटी भी मौजूद हो सकती है।
सही निदान के लिए विशेषज्ञ से सलाह जरूरी
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि केवल इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर स्वयं निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। विस्तृत मेडिकल हिस्ट्री, व्यवहार का मूल्यांकन और विशेषज्ञ द्वारा जांच के बाद ही सही निदान संभव है।
यदि ध्यान की कमी, अत्यधिक चिंता, बेचैनी या आवेगपूर्ण व्यवहार लंबे समय तक बना रहे और पढ़ाई, नौकरी या दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना सबसे सुरक्षित और प्रभावी कदम है।
