शरीरदान का सम्मान सर्वोपरि, कैडवर पर टिप्पणी को लेकर JDA का बयान
healthbhaskar.com नई दिल्ली, 13 जून 2026 । जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (JDA) ने एमबीबीएस की छात्रा सेजल पवार द्वारा कैडवर (शव) आधारित चिकित्सा शिक्षा को लेकर की गई कथित टिप्पणियों की कड़ी निंदा की है। एसोसिएशन ने कहा कि ये टिप्पणियां मेडिकल शिक्षा के स्थापित सिद्धांतों, शैक्षणिक उद्देश्यों और मानवीय मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं।
जे.डी.ए. ने जारी बयान में कहा कि यह मामला केवल मतभेद का नहीं, बल्कि सार्वजनिक मंचों पर जिम्मेदारीपूर्ण अभिव्यक्ति का भी है। किसी दान किए गए मानव शरीर को उपहास या सनसनीखेज प्रस्तुति का विषय नहीं बनाया जा सकता। शरीरदान चिकित्सा विज्ञान और मानवता के प्रति सबसे बड़ा परोपकारी योगदान माना जाता है।
एसोसिएशन ने कहा कि सदियों से मानव शरीरदान और कैडवर डिसेक्शन मेडिकल शिक्षा की आधारशिला रहे हैं। आधुनिक शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी), सर्जरी और चिकित्सा विज्ञान का विकास उन लोगों के योगदान से संभव हुआ है जिन्होंने ज्ञान के विस्तार के लिए अपने शरीर दान किए। इसलिए इस विषय पर चर्चा करते समय संवेदनशीलता, सटीकता और सम्मान बनाए रखना आवश्यक है।
जे.डी.ए. ने स्पष्ट किया कि एनाटॉमी शिक्षा और कैडवर अध्ययन विश्वभर में चिकित्सा प्रशिक्षण का अनिवार्य हिस्सा हैं। ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लीलता या दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले ‘परमानंद कटारा बनाम भारत संघ (1995)’ का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालय ने माना है कि गरिमा और सम्मान का अधिकार केवल जीवित व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि मृत शरीर पर भी लागू होता है। इसलिए शव के संरक्षण, अध्ययन, अनुसंधान और अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया सम्मानजनक और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए।
बयान में महर्षि दधीचि के त्याग का भी उल्लेख किया गया, जिन्हें भारतीय परंपरा में शरीरदान और मानव कल्याण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। जे.डी.ए. ने कहा कि भारतीय संस्कृति ने सदैव ऐसे महान कार्यों का सम्मान किया है, लेकिन आज भी देश की केवल लगभग 22 प्रतिशत आबादी ही शरीरदान के बारे में जागरूक है।
एसोसिएशन के अनुसार भारत में शरीरदान की व्यवस्था राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) तथा विभिन्न राज्यों के एनाटॉमी अधिनियमों के तहत संचालित होती है। मेडिकल शिक्षा में कैडवर की कमी का मुख्य कारण कानून नहीं, बल्कि जागरूकता की कमी, सामाजिक संकोच, पारिवारिक असहमति और शरीरदान को लेकर फैली भ्रांतियां हैं।
जे.डी.ए. ने समाज से शरीरदान के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने और चिकित्सा शिक्षा की गरिमा बनाए रखने की अपील की है।
