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“नेर्गे तन, नेर्गे मन”: भारत में स्वास्थ्य सेवा की दिशा पर पुनर्विचार की ज़रूरत

Healthbhaskar.comरायपुर 27  जनवरी , 2026। “नेर्गे तन, नेर्गे मन, इदे मावा जीवन” यह गोंडी कहावत केवल एक सांस्कृतिक उक्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का मूल दर्शन है। स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के बिना न तो व्यक्ति सशक्त हो सकता है और न ही राष्ट्र। इसके बावजूद, भारत में स्वास्थ्य सेवा आज भी प्राथमिक विमर्श से धीरे-धीरे बाहर होती जा रही है।

स्वतंत्रता के बाद स्वास्थ्य सेवा में उल्लेखनीय प्रगति

1947 के बाद भारत की स्वास्थ्य प्रणाली ने कई ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल की हैं। जहाँ 1947 में औसत जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष थी, वहीं 2020 तक यह बढ़कर लगभग 70 वर्ष हो गई। शिशु मृत्यु दर (IMR) में भी उल्लेखनीय गिरावट आई है। 1951 में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 146 से घटकर 2020 में 28 तक पहुँचना सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयासों की बड़ी सफलता मानी जाती है।

लेकिन क्या हम असली लक्ष्य से भटक रहे हैं?

हाल ही में एक प्रतिष्ठित अख़बार के अंग्रेज़ी संस्करण में 26 जनवरी 1950 के दशक के लेखों का पुनर्प्रकाशन किया गया। ये लेख विभिन्न मानवीय क्षेत्रों का सुंदर दस्तावेज़ हैं, लेकिन स्वास्थ्य सेवा के संदर्भ में इनमें भारत का आत्मनिर्भर दृष्टिकोण और भविष्यवादी स्वास्थ्य नीति लगभग अनुपस्थित दिखाई देती है। पूरे विमर्श में विश्व स्वास्थ्य संगठन और वैश्विक संस्थाओं की भूमिका तो दिखती है, पर भारतीय संदर्भ और ज़मीनी हकीकत गायब रहती है।

2026 में भी स्वास्थ्य क्यों बना ‘ग़ायब विषय’?

आज, आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी, स्वास्थ्य सेवा सार्वजनिक बहस का केंद्र नहीं बन पाई है।हम स्वास्थ्य पर तब बात करते हैं जब डॉक्टर सिस्टम छोड़ने लगते हैं, या मरीजों की मौत सुर्खियाँ बनती हैं, या स्वास्थ्य ढाँचा चरमराता है। यह चुप्पी अपने आप में एक गंभीर मानवीय विफलता को दर्शाती है।

असमानता की खाई और अधूरे सुधार

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता में भारी अंतर आज भी बना हुआ है। मानव संसाधन की कमी को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने मेडिकल शिक्षा में मानदंडों में ढील दी है, लेकिन विशेषज्ञों का सवाल है कि किस कीमत पर ? शिक्षा की गुणवत्ता और इंफ्रास्ट्रक्चर मानकों से समझौता कर तैयार किए गए डॉक्टर, भविष्य में मरीजों के लिए जोखिम बन सकते हैं।

आयुष्मान भारत: समानता की कोशिश, चुनौतियाँ बरकरार

आयुष्मान भारत योजना आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन इसके क्रियान्वयन, रेफरल सिस्टम और निजी–सरकारी संतुलन को लेकर कई व्यावहारिक चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं।

जन आंदोलन के बिना अधूरी रहेगी सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा

भारत की स्वास्थ्य यात्रा उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों से भरी है। इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार, मानव संसाधन में निवेश और तकनीक का उपयोग,ये सभी आवश्यक हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। जब तक स्वास्थ्य को लेकर अख़बारों की हेडलाइन, संसद की बहस और सामाजिक संवाद का केंद्र नहीं बनाया जाएगा, तब तक नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच का अंतर बना रहेगा।

स्वास्थ्य केवल एक सेक्टर नहीं, बल्कि राष्ट्र की रीढ़- डॉ. अमित बंजारा

डॉ. अमित बंजारा, सचिव जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन ,पं. जेएनएमएमसी, रायपुर ने कहा कि स्वास्थ्य केवल एक सेक्टर नहीं, बल्कि राष्ट्र की रीढ़ है। यदि भारत के गणतंत्र को सच में सशक्त बनाना है, तो स्वास्थ्य को नीति, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श तीनों के केंद्र में लाना होगा। महान चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स के शब्द आज भी प्रासंगिक हैं, जो वर्तमान परिस्थितियों से भविष्य को समझ लेता है, वही इलाज को सबसे बेहतर ढंग से प्रबंधित कर सकता है।

 

 

 

 

 

 

 


 

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