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छत्तीसगढ़ के युवा डॉक्टरों के ‘डबल फ्रेगमेंटेशन’ के शिकार — संवैधानिक नियमों की गणितीय उलझन ने रोका भविष्य

Healthbhaskar.com: रायपुर, 22 नवंबर 2025 नीट-पीजी 2025 की काउंसलिंग प्रक्रिया इस समय गंभीर संवैधानिक, भावनात्मक और शैक्षणिक संकट के दौर से गुजर रही है। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य कोटे में संस्थागत प्राथमिकता (Institutional Preference) को रद्द करने के बाद, राज्य के मेडिकल कॉलेजों से एमबीबीएस करने वाले हजारों युवा डॉक्टर अपने भविष्य को लेकर असमंजस और निराशा की स्थिति में हैं।

डॉक्टर्स का आरोप है कि वे Double Fragmentation यानी दोहरी चोट का शिकार हो गए हैं। पहली डोमिसाइल नियम के कारण वे अपने जन्म-राज्य की सीटों के लिए अपात्र हैं। दूसरी, जिस राज्य में उन्होंने MBBS किया और सेवा दी, वहीं अब उनसे संस्थागत प्राथमिकता का अधिकार छीन लिया गया है।

छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडरेशन के अध्यक्ष डॉ. हीरा सिंह का कहना है कि यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या और शब्दावली के गणितीय भ्रम के कारण पैदा हुआ है। उन्होंने मामले में स्पष्टी करण करते हुए बताया की 1. 50% का गणित: ‘कुल सीटें’ बनाम ‘राज्य कोटा’ असली गलतफहमी है। विवाद की जड़ यह है कि संस्थागत प्राथमिकता किस पूल में दी जाए ? हाई कोर्ट ने माना कि राज्य कोटा अलग पूल है और इसमें 100% सीटें संस्थागत प्राथमिकता देना गलत है।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Saurabh Chaudhary (2003) फैसले में कहा कि संस्थागत प्राथमिकता कुल सीटों के 50% तक दी जा सकती है। छत्तीसगढ़ में 50% सीटें पहले ही AIQ के लिए रिज़र्व हैं। इसलिए बचा हुआ 50% यानी पूरा राज्य कोटा संस्थागत प्राथमिकता के दायरे में आता है। यदि राज्य 50% AIQ + 50% Institutional Preference अपनाता है, तो यह ठीक वही मॉडल है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने वैध माना है।

Reasonable Number की गलत व्याख्या यह भी बड़ा भ्रम !

हाई कोर्ट ने डॉ. तन्वी बहल केस (2025) का हवाला देते हुए कहा की केवल उचित संख्या (Reasonable Number) में प्राथमिकता दी जा सकती है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के विशेषज्ञों के अनुसार Reasonable Number = कुल सीटों का 50% है। यह परिभाषा कोर्ट ने कई मामलों में खुद दी है। चूँकि राज्य कोटा कुल सीटों का ठीक 50% है तथा इसमें संस्थागत प्राथमिकता देना पूरी तरह संविधान सम्मत है। यदि इसे ओपन मेरिट कर दिया जाएगा तो 50% से अधिक सीटें बाहरी राज्यों के छात्रों को मिल जाएंगी।यह स्थानीय छात्रों के लिए स्पष्ट अन्याय होगा।

दिल्ली मॉडल वैध है, पर छत्तीसगढ़ में क्यों अस्वीकार ?

छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडेरशन का सबसे बड़ा सवाल यही है की देश की राजधानी में दिल्ली में यह मॉडल वैध है, पर छत्तीसगढ़ में क्यों लागु नहीं ? दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और IP University (IPU) की व्यवस्था में 50% सीटें AIQ (Open Merit) के तहत है एवं 50% सीटें 100% Institutional Preference केवल DU/IPU MBBS graduates के लिए है। यही मॉडल सुप्रीम कोर्ट ने Saurabh Chaudhary (2003) में सही ठहराया है ,तो फिर वही व्यवस्था छत्तीसगढ़ में अवैध कैसे हो सकती है?

छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडेरशन का कहना है की दिल्ली में सब ठीक है, लेकिन वही कॉपी-पेस्ट मॉडल छत्तीसगढ़ में असंवैधानिक? यह दोहरा मापदंड कैसे?

युवा डॉक्टरों पर “Double Fragmentation” की दोहरी साफ़ नज़र आ रही है। छत्तीसगढ़ की स्थिति और राज्यों से बिल्कुल अलग है।यहाँ MBBS करने वाले डॉक्टर्स का भविष्य तीन हिस्सों में बँट गया है जिसमे सबसे पहले डोमिसाइल नियम के अंतर्गत दूसरे राज्यों के PG सीटों के लिए पात्र नहीं है। दूसरी और Institutional Preference हटना जिसमे अब छत्तीसगढ़ की PG सीटों में भी विशेष अधिकार नहीं रख पाएँगे। तीसरा अहम् पहलु Federal Structure की गलत समझ होना जिसमे कई राज्यों में छूट है लेकिन छत्तीसगढ़ में निषेध है,इसलिए डॉक्टर्स इसे “Double Fragmentation” कह रहे हैं।

समाधान क्या ? नियम हटाने से नहीं, री-फ्रेम करने से हल निकलेगा

छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडेरशन ने सुझाव दिया है की यदि सरकार अधिसूचना जारी करे कि AIQ = कुल सीटों का 50% (Open Merit) तथा State Quota कुल सीटों का 50% (Institutional Preference) रहेगा तो यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन होगा,एवं हाई कोर्ट की आपत्तियाँ दूर होंगी। साथ ही राज्य के MBBS छात्रों को उनका संवैधानिक अधिकार मिलेगा। समस्या नियम हटाने से नहीं, गलत भाषा और गलत व्याख्या से है। इसे ठीक करते ही विवाद समाप्त हो सकता है।

समय कम, भविष्य दांव पर

नीट-पीजी 2025 की काउंसलिंग शुरू हो चुकी है। हजारों युवा डॉक्टरों का भविष्य इस “गणितीय भ्रम” पर निर्भर है। काउंसलिंग विशेषज्ञों के अनुसार यदि सरकार ने शीघ्र संशोधित नीति जारी नहीं की तो हजारों स्थानीय उम्मीदवार सीट से वंचित हो जाएँगे। छत्तीसगढ़ में PG सीटों पर बाहरी राज्यों का कब्ज़ा बढ़ जाएगा। MBBS छात्रों का “शैक्षणिक पलायन” (Academic Exodus) शुरू हो सकता है। छात्रों, फेडरेशन और कानूनी विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है की छत्तीसगढ़ का मॉडल वैधानिक, संवैधानिक और न्यायसंगत है। केवल उसे सही भाषा में पुनः अधिसूचित करने की आवश्यकता है।

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