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पीजीआई चंडीगढ़ की ऐतिहासिक शोध, सल्फास ज़हर के इलाज में नई उम्मीद

Healthbhaskar.com:  चंडीगढ़ 03 फरवरी 2026। खेती में उपयोग होने वाली कीटनाशक दवा सल्फास (एल्यूमिनियम फॉस्फाइड) लंबे समय से देश में आत्महत्या और आकस्मिक विषाक्तता का बड़ा कारण रही है। विशेषज्ञों के अनुसार सल्फास की बेहद कम मात्रा भी शरीर में पहुँचने पर जानलेवा साबित होती है। अब तक इसे सबसे घातक ज़हरों में गिना जाता रहा है, क्योंकि इसके लिए कोई प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं था।

चंडीगढ़ पीजीआई की ऐतिहासिक उपलब्धि

पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGI चंडीगढ़) के डॉक्टरों ने इस धारणा को तोड़ते हुए एक बड़ी चिकित्सा उपलब्धि हासिल की है। PGI के आंतरिक चिकित्सा विभाग द्वारा किए गए अध्ययन में यह प्रमाणित किया गया है कि समय रहते इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन (ILE) थेरेपी देकर सल्फास ज़हर से पीड़ित गंभीर मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

कैसे काम करती है ILE थेरेपी

इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन (ILE) थेरेपी शरीर में ज़हर के प्रभाव को कम करने में सहायक होती है। यह थेरेपी ज़हर के टॉक्सिक प्रभाव को “बांधकर” उसके असर को सीमित करती है, जिससे हृदय और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को बचाया जा सकता है। PGI के अध्ययन में यह सामने आया कि सही समय पर ILE सपोर्ट मिलने से मरीज की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

हर साल हजारों जानें जाती हैं सल्फास से

भारत में हर वर्ष घरेलू तनाव, आर्थिक दबाव और मानसिक अवसाद के कारण सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों लोग सल्फास ज़हर निगल लेते हैं। कई मामलों में तो सल्फास की गोली जीभ पर रखते ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। ऐसे में PGI का यह शोध जनस्वास्थ्य के लिहाज से मील का पत्थर माना जा रहा है।

ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों के लिए बड़ी राहत

सबसे अहम बात यह है कि इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन (ILE) पहले से ही जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में उपलब्ध है। इसका मतलब यह है कि अब ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में भी सल्फास ज़हर के मरीजों को समय पर इलाज देकर उनकी जान बचाई जा सकती है।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध

पीजीआई चंडीगढ़ के डॉक्टरों द्वारा किए गए इस शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल यूरोपियन रिव्यु ऑफ़ मेडिकल एंड फ़रमालोजिकल साइंस में प्रकाशित किया गया है। इससे उत्तर भारत की एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या को वैश्विक पहचान मिली है।

किसके नेतृत्व में हुआ अध्ययन

यह अध्ययन आंतरिक चिकित्सा विभाग के प्रो. संजय जैन, डीन अकादमिक एवं विभागाध्यक्ष, के मार्गदर्शन में किया गया। मुख्य शोधकर्ता डॉ. मंदीप सिंह भाटिया एसोसिएट प्रोफेसर तथा डॉ.सौरभ चंद्रभान शारदा सह-शोधकर्ता शामिल है । इस शोध को पीजीआई की मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च सेल MERC, से वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ।

जनस्वास्थ्य के लिए नई उम्मीद

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस थेरेपी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोटोकॉल में शामिल किया जाता है, तो सल्फास ज़हर से होने वाली मौतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। यह शोध आत्महत्या रोकथाम और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के क्षेत्र में नई दिशा दे सकता है।

 


 

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