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-40 अंक पर पीजी सीट देना – चिकित्सा शिक्षा और जनस्वास्थ्य के भविष्य के साथ खतरनाक खिलवाड़

Healthbhaskar.com: रायपुर, 15 जनवरी 2026। हाल ही में नीट पीजी परीक्षा में -40 अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों का चयन होना न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह पूरे भारतीय चिकित्सा तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। -40 अंक का सीधा और वैज्ञानिक अर्थ है कि अभ्यर्थी एक भी प्रश्न सही नहीं कर सका, बल्कि अधिकांश उत्तर गलत रहे है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस स्तर की योग्यता के साथ किसी को देश का स्पेशलिस्ट डॉक्टर बनने दिया जाना चाहिए या नहीं ?

स्पेशलिस्ट डॉक्टर और जनता की सुरक्षा

जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. रेशम सिंह ने बताया की पीजी करने के बाद यही अभ्यर्थी आगे चलकर एनाटॉमी, पैथोलॉजी, जनरल सर्जरी, न्यूरोसर्जरी, कार्डियोलॉजी या गैस्ट्रोएंटरोलॉजी जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी मेडिकल सेवाएँ देंगे। जब ऐसे डॉक्टर मरीज का ऑपरेशन करेंगे या मेडिकल छात्रों को पढ़ाएंगे, तब आम जनता और आने वाली पीढ़ी के डॉक्टरों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा? चिकित्सा विज्ञान में एक छोटी सी गलती भी किसी मरीज की जान ले सकती है।

शिक्षक बने तो भविष्य अंधकारमय

यदि इस न्यूनतम योग्यता के साथ चयनित उम्मीदवार मेडिकल कॉलेजों में शिक्षक बनते हैं, तो आने वाले वर्षों में डॉक्टरों की गुणवत्ता किस स्तर तक गिरेगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। कमजोर शिक्षक, कमजोर छात्र और अंततः कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली यही इस नीति का स्वाभाविक परिणाम होगा।

कम अंक ,कम योग्यता, इसमें कोई भ्रम नहीं

चिकित्सा शिक्षा में कम नंबर का अर्थ सीधा कम योग्यता होता है। इसे किसी नियम, छूट या दबाव के जरिए बदला नहीं जा सकता। डॉक्टर वही होना चाहिए जो ज्ञान, मेहनत और काबिलियत के आधार पर आगे आए, न कि इसलिए कि सिस्टम ने अयोग्यता के लिए दरवाजे खोल दिए हो।

पैसा और रसूख बनाम मेहनत

डॉ. रेशम सिंह ने कहा की इस तरह के नियमों से सबसे ज्यादा लाभ उन लोगों को मिलेगा जिनके पास पैसा और प्रभाव है। मेहनती, ईमानदार और योग्य छात्र पीछे रह जाएंगे। प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में सीटों की खुली खरीद-फरोख्त बढ़ेगी। जो लेन-देन आज परदे के पीछे होता है, वह कल खुलेआम होने लगेगा। मेडिकल सीटें योग्यता नहीं, बोली के आधार पर बिकेंगी।

मरीज नहीं, ‘क्लाइंट’ बन जाएगी जनता

जब डॉक्टर पैसे और जुगाड़ से बनेंगे, तो मरीज उनके लिए इंसान नहीं, सिर्फ क्लाइंट होगा। इलाज सेवा नहीं, व्यापार बन जाएगा। इसका सबसे बड़ा नुकसान गरीब और मध्यम वर्ग को होगा, जिनके लिए अस्पताल पहले ही आर्थिक बोझ बने हुए हैं।

इंजीनियरिंग की तरह बर्बादी की राह

डॉ. रेशम सिंह ने कहा की जिस तरह इंजीनियरिंग में अंधाधुंध सीटें बढ़ाकर उसकी गुणवत्ता खत्म कर दी गई, उसी रास्ते पर अब चिकित्सा शिक्षा को धकेला जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इंजीनियर की गलती से मशीन खराब होती है, लेकिन डॉक्टर की गलती से मरीज़ को अपनी जान गवानी पड़ती है।

यह शिक्षा नहीं, करोड़ों जिंदगियों का सवाल है

-40 अंक पर पीजी सीट देने का निर्णय केवल शिक्षा नीति का मामला नहीं है, यह करोड़ों भारतीयों के जीवन और भरोसे से जुड़ा प्रश्न है। सरकार, नीति निर्धारकों और मेडिकल काउंसिल को यह समझना होगा कि डॉक्टर बनाना कोई फैक्ट्री का काम नहीं है। यहां संख्या नहीं, गुणवत्ता ही सबसे अहम् है।

तुरंत पुनर्विचार की जरूरत

डॉ. रेशम सिंह ने यह स्पष्ट किया है की यह लड़ाई किसी संगठन या व्यक्ति की नहीं है। यह हर उस आम आदमी की लड़ाई है जो बीमारी में डॉक्टर के सामने खड़ा होता है और उम्मीद करता है कि सामने वाला सच में काबिल हो। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो भविष्य में अस्पताल भरोसे की जगह डर का कारण बन जाएंगे। मरीज इलाज कराने नहीं, किस्मत आजमाने जाएगा। इसलिए जरूरी है कि न्यूनतम योग्यता को सख्ती से लागू किया जाए और मेडिकल शिक्षा को पैसे का खेल बनने से रोका जाए।


 

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