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जब संवाद विफल हो जाए, तब न्याय और लोकतंत्र बनते हैं अंतिम विकल्प – डॉ. रेशम सिंह

Healthbhaskar.com: रायपुर, 20 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ की जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था, चिकित्सकों की अनदेखी और मेडिकल शिक्षा से जुड़ी गंभीर समस्याओं को लेकर राज्य के चिकित्सा विद्यार्थियों एवं डॉक्टरों ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। लंबे समय से सरकार से संवाद, ज्ञापन, बैठकों और आश्वासनों के बावजूद जब किसी भी समस्या का ठोस समाधान नहीं निकला, तब मजबूर होकर चिकित्सकों ने न्यायालय, मीडिया और लोकतंत्र के अन्य स्तंभों की शरण लेने का निर्णय किया है।

इसी क्रम में जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन, जेडीए के प्रतिनिधिमंडल ने नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत एवं पूर्व विधायक तथा पूर्व जेडीए अध्यक्ष डॉ. विनय जायसवाल से मुलाकात कर राज्य के चिकित्सा तंत्र में व्याप्त गहन विसंगतियों से उन्हें अवगत कराया है, तथा प्रतिनिधिमंडल ने प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थिति, चिकित्सकों के शोषण और आम जनता पर पड़ रहे इसके दुष्परिणामों पर विस्तार से चर्चा की गयी।

NEET PG में सीटों की बंदरबांट पर लगा विराम, ऐतिहासिक उपलब्धि

बैठक के दौरान चिकित्सकों ने NEET PG में सीटों की कथित “बंदरबांट” प्रणाली के खिलाफ संघर्ष में मिले सहयोग के लिए नेता प्रतिपक्ष और पूर्व विधायक का आभार व्यक्त किया। चिकित्सकों का कहना है कि उनके सहयोग से प्रदेश के मेडिकल विद्यार्थियों को न्याय मिला, जो कि छत्तीसगढ़ के चिकित्सा शिक्षा इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे यह संदेश गया कि यदि आवाज संगठित हो, तो अन्याय के खिलाफ जीत संभव है।

सुपर स्पेशलिस्ट कैडर का अभाव: जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़

प्रदेश में सुपर स्पेशलिस्ट कैडर का न होना सबसे बड़ी प्रशासनिक चूक मानी जा रही है। इस वजह से सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में कार्य करने से कतरा रहे हैं। परिणामस्वरूप राजधानी रायपुर स्थित डीकेएस सुपरस्पेशलिटी अस्पताल के कई विभाग बंद पड़े हैं। वहीं, बिलासपुर स्थित सिम्स और जगदलपुर में करोड़ों की लागत से बने सुपरस्पेशलिटी अस्पतालों में डॉक्टरों का अभाव है। 200-200 करोड़ रुपये खर्च कर बनाए गए भवन जब केवल ईंट-पत्थर बनकर खड़े हों, तो यह विकास नहीं, बल्कि जनता के पैसों की बर्बादी और स्वास्थ्य से घोर लापरवाही का प्रतीक बन जाता है।

आयुष्मान इंसेंटिव और भुगतान लंबित: मरीजों की बढ़ती परेशानी

प्रदेश में डॉक्टरों का आयुष्मान भारत इन्सेंटिव्स वर्ष 2023 से लंबित है। इसके साथ ही छोटे निजी अस्पतालों को भी आयुष्मान योजना के अंतर्गत भुगतान नहीं मिल पा रहा है। इससे अस्पतालों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है और मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है। मरीज इलाज के लिए दर-दर भटक रहे हैं, गंभीर बीमारियों में समय पर उपचार नहीं मिलने से जान का जोखिम बढ़ रहा है।

प्रमोशन और भर्ती पर ब्रेक: मेडिकल कॉलेजों में 75% पद रिक्त

सरकार द्वारा न तो नियमित भर्ती की जा रही है और न ही प्रमोशन प्रक्रिया को गति दी गई है। परिणामस्वरूप प्रदेश के 12 मेडिकल कॉलेजों में लगभग 75 प्रतिशत पद खाली हैं। इसका असर न केवल मरीजों की चिकित्सा सेवाओं पर पड़ रहा है, बल्कि मेडिकल छात्रों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। शिक्षकों की कमी के कारण क्लिनिकल प्रशिक्षण कमजोर पड़ रहा है, जिससे भविष्य के डॉक्टरों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।

बॉन्ड नीति: डॉक्टरों को बंधुआ मजदूर बनाने का आरोप

प्रदेश की बॉन्ड नीति को लेकर चिकित्सकों में भारी आक्रोश है। डॉक्टरों को स्थायी नियुक्ति देने के बजाय उन्हें बॉन्ड पोस्टिंग में भेजा जा रहा है। यदि कोई डॉक्टर उच्च अध्ययन के लिए चयनित हो जाए, तो उससे MBBS के बाद 25 लाख रुपये एवं PG के बाद ₹50 लाख रुपये, या भूमि गिरवी रखने की शर्त बांड निति के तहत रखी जाती है। ऐसी बांड निति के प्रति चिकित्सकों का कहना है कि यह शिक्षा नहीं, बल्कि “फिरौती प्रणाली” है, जो संविधान प्रदत्त शिक्षा के अधिकार का खुला उल्लंघन है।

इलाज के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर छत्तीसगढ़

विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी के कारण छत्तीसगढ़ के मरीजों को इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है। गंभीर बीमारियों के उपचार हेतु लोग निजी कॉर्पोरेट अस्पतालों में अपनी जमीन, गहने और जीवनभर की बचत तक बेचने को मजबूर हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था किस कदर बदहाल हो चुकी है और इसकी कीमत आम नागरिक अपनी जान और संपत्ति से चुका रहा है।

जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन, जेडीए संगठन ने अपनी मांगें सरकार से समक्ष्य रखीं है जिनमे ,सुपर स्पेशलिस्ट कैडर तत्काल लागू किया जाना चाहिए।आयुष्मान इंसेंटिव और लंबित भुगतान तुरंत जारी किया जाए। नियमित भर्ती और प्रमोशन प्रक्रिया शीघ्र शुरू की जाए तथा बॉन्ड नीति को तर्कसंगत और न्यायसंगत बनाया जाए। डॉ. रेशम सिंह ने कड़े शब्दों कहा है कि यदि सरकार ने अब भी गंभीरता नहीं दिखाई, तो आंदोलन को कानूनी, लोकतांत्रिक और जनहितकारी तरीके से और अधिक व्यापक स्तर पर चलाया जाएगा।

नेतृत्व की भूमिका

इस पूरे आंदोलन का नेतृत्व डॉ. रेशम सिंह अध्यक्ष, जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन, छत्तीसगढ़ कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब सरकार बार-बार सुनकर भी समाधान न दे, तो न्याय और लोकतंत्र के दरवाज़े खटखटाने पड़ते है। यह संघर्ष केवल डॉक्टरों के हित का नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता के बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य के लिए है।

 

 


 

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