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7 घंटे की जटिल सर्जरी से एम्स रायपुर के डॉक्टरों ने बचाया युवती का पैर, हड्डी के कैंसर को दी मात

Healthbhaskar.comरायपुर 28  जनवरी , 2026। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स,रायपुर के चिकित्सकों ने चिकित्सा उत्कृष्टता का एक और कीर्तिमान स्थापित करते हुए 27 वर्षीय युवती के पैर की हड्डी को दोबारा हुए कैंसर से बचाने में सफलता हासिल की है। यह मरीज पहले ही अन्य अस्पतालों में दो असफल शल्य क्रियाओं से गुजर चुकी थी और गंभीर दर्द, चलने में कठिनाई तथा अंग खराब होने के खतरे का सामना कर रही थी।

जायंट सेल ट्यूमर की जटिल चुनौती

मरीज को टिबिया हड्डी में जायंट सेल ट्यूमर (Giant Cell Tumour – GCT) का निदान हुआ था, जो हड्डी के आसपास फैल चुका था और आसपास की कोशिकाओं को भी प्रभावित कर रहा था। ट्यूमर के बार-बार लौटने के कारण स्थिति अत्यंत जटिल हो गई थी। ऐसे में चिकित्सकों के सामने ट्यूमर को पूरी तरह निकालने के साथ-साथ वजन सहने वाली हड्डी का पुनर्निर्माण एक बड़ी चुनौती था।

7 घंटे चली हाई-रिस्क लिम्ब-सेल्वेज सर्जरी

एम्स रायपुर की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम ने एक उन्नत और उच्च जोखिम वाली लिम्ब-सेल्वेज सर्जरी की योजना बनाई, जो इस क्षेत्र में विरल रूप से की जाती है। लगभग 7 घंटे तक चली इस जटिल सर्जरी में ऑर्थोपेडिक्स विभाग की टीम ने डॉ. बिक्रम कार के नेतृत्व में ट्यूमर को पूरी तरह निकाला गया , जिससे टिबिया में लगभग 18 सेंटीमीटर का बड़ा बोन डिफेक्ट की समस्या सामने आयी।

माइक्रोवैस्कुलर तकनीक से हड्डी का पुनर्निर्माण

इसके पश्चात प्लास्टिक सर्जरी विभाग की टीम ने डॉ. जितेन मिश्रा के नेतृत्व में मरीज के विपरीत पैर से वैस्कुलराइज्ड फिबुला बोन ग्राफ्ट लेकर माइक्रोवैस्कुलर सर्जरी की सहायता से क्षतिग्रस्त हिस्से का पुनर्निर्माण किया गया। पूरी सर्जरी एनेस्थीसिया टीम डॉ. सरिता रामचंदानी के नेतृत्व में सफलतापूर्वक संपन्न हुई।

अत्यधिक सटीकता की मांग वाली प्रक्रिया

ऐसी सर्जरी अत्यंत सटीकता की मांग करती है, जहां रक्त प्रवाह में मामूली बाधा भी पूरे अंग के विफल होने का कारण बन सकती है। एम्स रायपुर की चिकित्सकीय टीम की विशेषज्ञता और समन्वय के कारण बोन ग्राफ्ट पूरी तरह सफल रहा और पैर की रक्त आपूर्ति सुरक्षित बनी रही।

तीन सप्ताह में स्थिर स्थिति में डिस्चार्ज

सर्जरी के बाद मरीज को तीन सप्ताह तक गहन पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल में रखा गया, जिसके बाद उसे स्थिर अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। चिकित्सकों के अनुसार मरीज शीघ्र ही आंशिक वजन डालकर चलना शुरू कर पाएंगी और अगले दो महीनों में स्वतंत्र रूप से चलने की प्रबल संभावना है।

संस्थान की प्रतिबद्धता का प्रतीक

इस उपलब्धि की सराहना करते हुए कार्यपालक निदेशक एवं सीईओ लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) ने कहा कि यह सर्जरी एम्स रायपुर की उन्नत अंग-संरक्षण चिकित्सा सेवाओं और रोगी-केंद्रित देखभाल के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उन्होंने पूरी टीम के समन्वित प्रयासों की प्रशंसा की। ऐसी ऐतिहासिक सर्जरी न केवल एक युवती का पैर बचाने में सफल रही, बल्कि उसकी गरिमा, गतिशीलता और भविष्य की आशाओं को भी पुनः जीवित कर गई।


 

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