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दुर्लभ बीमारी और दुर्लभ ब्लड ग्रुप के बावजूद बची मां की जान, गोद में लौटा मासूम

Healthbhaskar.com: रायपुर, 17 फरवरी 2026। कोरिया जिले की 20 वर्षीय युवा मां के लिए साधारण सा बुखार और लगातार खांसी उसकी ज़िंदगी की सबसे कठिन और भयावह लड़ाई में तब्दील हो जाएगी, इसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। प्रसव के मात्र छह महीने बाद उसकी सेहत अचानक बिगड़ने लगी। धीरे-धीरे वह इतनी कमजोर हो गई कि साधारण घरेलू कार्य भी उसके लिए असंभव हो गए थे। अपने शिशु को गोद में उठाना, उसे दूध पिलाना और उसकी देखभाल करना तक उसके लिए चुनौती बन गया। लगातार कमजोरी, सांस फूलना और अत्यधिक थकान ने उसके सामान्य जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया था।

इलाज के बावजूद बिगड़ती हालत

प्रारंभ में स्थानीय स्तर पर उसका उपचार कराया गया, जहां उसे सीने के संक्रमण और गंभीर एनीमिया के लिए इलाज दिया गया। कई सप्ताह तक दवाइयों और उपचार के बावजूद उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि उसकी स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई थी। मरीज के साथ सबसे बड़ी चुनौती तब सामने आई जब यह पता चला कि उसका ब्लड ग्रुप अत्यंत दुर्लभ बॉम्बे ब्लड ग्रुप है। इस विशेष रक्त समूह के कारण जरूरत पड़ने पर रक्त चढ़ाना लगभग असंभव हो गया, क्योंकि छत्तीसगढ़ में उपयुक्त रक्तदाता मिलना अत्यंत कठिन था। दूसरी तरफ मरीज का हीमोग्लोबिन का स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था और शरीर के कई अंग प्रभावित होने लगे थे।

मानसिक स्थिति भी हुई गंभीर

इस केस में स्थिति तब और भयावह हो गई जब मरीज की मानसिक स्थिति में भी गंभीर बदलाव आने लगे। वह अपने परिवार से बात करना बंद करने लगी, शिशु को गोद में लेने से इनकार करने लगी और बिना किसी स्पष्ट कारण के रोने लगी। कई बार वह अनुचित और असामान्य ढंग से हंसने लगती थी। परिजन असामान्य व्यवहार देख के भयभीत हो गए थे । उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनकी बेटी को आखिर क्या हो रहा है। निराशा और असमंजस के बीच परिवार ने अंतिम उम्मीद के तौर पर उसे एम्स रायपुर लाने का निर्णय लिया।

एम्स रायपुर में प्रारंभिक जांच और बड़ा खुलासा

एम्स रायपुर पहुंचने पर मरीज को जनरल मेडिसिन विभाग में भर्ती किया गया। यहां विस्तृत जांच के बाद चिकित्सकों को सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (SLE) नामक गंभीर ऑटोइम्यून बीमारी का संदेह हुआ। इसके बाद उसे क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों के पास रेफर किया गया। इस विभाग की टीम, जिसका नेतृत्व डॉ. जॉयदीप सामंता और डॉ. रश्मि रंजन साहू कर रहे थे जिन्होंने गहन परीक्षणों के बाद पुष्टि की कि मरीज गंभीर लूपस ऑटोइम्यून बीमारी से पीड़ित है।

एक साथ कई अंगों पर हमला

डॉक्टरों के अनुसार, यह बीमारी मरीज के मस्तिष्क, गुर्दों, फेफड़ों और रक्त प्रणाली को एक साथ प्रभावित करती है तथा यह स्थिति अत्यंत जटिल और जानलेवा होती है। लूपस एक ऐसी ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली खुद के अंगों पर हमला करने लगती है। यदि समय पर इलाज न मिले, तो यह बहु-अंग विफलता और मृत्यु तक का कारण बन सकती है।

बॉम्बे ब्लड ग्रुप बना सबसे बड़ी चुनौती

इस जटिल स्थिति में उपचार को और कठिन बना दिया मरीज का दुर्लभ बॉम्बे ब्लड ग्रुप, जिसके कारण रक्त चढ़ाना लगभग असंभव था। ऐसे मामलों में थोड़ी सी लापरवाही भी जानलेवा सिद्ध हो सकती है। इसके बावजूद एम्स रायपुर की चिकित्सकीय टीम ने अत्यंत सावधानी के साथ इम्यूनोसप्रेसिव उपचार शुरू किया, जिससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को नियंत्रित किया जा सके।

धीरे-धीरे अंगों में दिखने लगा सुधार

सघन चिकित्सा निगरानी और अत्याधुनिक इलाज के परिणाम स्वरूप मरीज के फेफड़ों, गुर्दों और रक्त प्रणाली की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आने लगा। उसके शरीर के प्रमुख अंगों की कार्यक्षमता लौटने लगी, जिससे उसकी हालत स्थिर होने लगी। हालांकि, उसकी मानसिक स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई थी। वह न तो ठीक से बात कर पा रही थी और न ही भावनात्मक रूप से स्थिर थी।

बहु-विषयक टीम और इलेक्ट्रोकोन्वल्सिव थेरेपी का निर्णय

इसके बाद मरीज के इलाज में मनोचिकित्सकों और न्यूरोलॉजिस्ट सहित एक बहु-विषयक टीम को शामिल किया गया। विशेषज्ञों की सलाह पर मरीज को इलेक्ट्रोकोन्वल्सिव थेरेपी (ECT) दी गई। लगातार आठ सत्रों और दवाओं के समुचित संयोजन के बाद मरीज की मानसिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। वह धीरे-धीरे बोलने लगी, परिवार को पहचानने लगी और शिशु के प्रति फिर से भावनात्मक जुड़ाव दिखाने लगी।

दो महीने बाद मिली अस्पताल से छुट्टी

लगभग दो महीने के गहन उपचार के बाद दिसंबर 2025 में मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी गईं थी ,उस समय वह शारीरिक और मानसिक रूप से पहले की तुलना में कहीं अधिक स्वस्थ नज़र आ रही थी। फरवरी 2026 में जब वह पुनः ओपीडी में फॉलो-अप के लिए बुलाया गया। उस समय चिकित्सक और परिजन उसे देखकर भावुक हो उठे और उन्होंने देखा की वह आत्मविश्वास से चल रही थी और अपने शिशु को गोद में लिए हुए थी ,यह दृश्य पूरी चिकित्सा टीम के लिए गर्व और संतोष का क्षण था।

समय पर निदान से बच सकती हैं जटिलताएँ

चिकित्सकों ने बताया कि ऑटोइम्यून बीमारी का शीघ्र निदान अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि समय पर इलाज से गंभीर जटिलताओं, अंग विफलता और मृत्यु के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इस केस ने यह सिद्ध कर दिया कि समय पर विशेषज्ञ इलाज और बहु-विषयक चिकित्सा से अत्यंत जटिल रोगों में भी जीवन बचाया जा सकता है।

एम्स रायपुर की उन्नत रूमेटोलॉजी सेवाएं बनीं संजीवनी

एम्स रायपुर के कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) ने इस ऐतिहासिक सफलता के लिए पूरी चिकित्सकीय टीम की सराहना की है तथा उन्होंने कहा कि संस्थान में अब उन्नत रूमेटोलॉजी सेवाएं उपलब्ध हैं, जिससे गंभीर रोगों से पीड़ित मरीजों को राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यह उपलब्धि न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि आसपास के राज्यों के मरीजों के लिए भी नई उम्मीद लेकर आई है।

चिकित्सा क्षेत्र में नई मिसाल

यह केस एम्स रायपुर की चिकित्सकीय दक्षता, तकनीकी उन्नयन और मानवीय दृष्टिकोण का जीवंत उदाहरण है। दुर्लभ लूपस, बॉम्बे ब्लड ग्रुप और गंभीर मानसिक जटिलताओं जैसे कारकों के बावजूद मरीज की जान बचाना चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

 


 

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