Mon. Feb 23rd, 2026

आर्सेनिक-फ्लोराइड युक्त पानी से तबाही, किडनी रोग से कराहता सुपेबेड़ा गांव

Healthbhaskar.com: गरियाबंद , 23 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के सुपेबेड़ा गांव में स्वच्छ पेयजल की कमी अब एक भयानक मानवीय त्रासदी में बदल चुकी है। वर्षों से आर्सेनिक और फ्लोराइड युक्त जहरीला पानी पीने को मजबूर ग्रामीणों की जिंदगी पर इसका सीधा असर पड़ा है। अब तक लगभग 135 ग्रामीणों की किडनी फेल होने से मौत हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं।

पांच साल में उजड़ते परिवार, बढ़ता दर्द

सुपेबेड़ा गांव की कुल आबादी करीब दो हजार है। बीते पांच वर्षों में यहां लगातार किडनी रोगियों की संख्या बढ़ती चली गई। गंभीर बीमारी से जूझते ग्रामीणों को इलाज के लिए रायपुर, महासमुंद और ओडिशा तक दौड़ लगानी पड़ती है। कई परिवार इलाज के खर्च में अपनी जमीन, गहने और मवेशी तक बेच चुके हैं, फिर भी जान नहीं बचा पाए।

जहरीला पानी बना मौत का कारण

विशेषज्ञों के अनुसार, गांव के बोरवेल और जलस्रोतों में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा तय मानकों से कई गुना अधिक है। लंबे समय तक इस पानी के सेवन से किडनी, लीवर और हड्डियों पर गंभीर असर पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई जांच में भी पानी के असुरक्षित होने की पुष्टि हुई थी, इसके बावजूद सुरक्षित पेयजल की स्थायी व्यवस्था नहीं की गई।

दो साल से नहीं लगा स्वास्थ्य शिविर, जांच बंद

ग्रामीणों का कहना है कि पहले किडनी जांच शिविर लगते थे, जिससे समय रहते बीमारी का पता चल जाता था। लेकिन पिछले दो वर्षों से कोई शिविर आयोजित नहीं हुआ, जिससे रोगियों की पहचान और उपचार दोनों प्रभावित हुए हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की इस लापरवाही ने स्थिति को और भयावह बना दिया है।

जल जीवन मिशन पर भी सवाल

सरकार की बहुप्रचारित जल जीवन मिशन योजना भी सुपेबेड़ा के लिए अब तक कारगर साबित नहीं हो सकी है। पानी शुद्धिकरण संयंत्र का निर्माण वर्षों से अधूरा पड़ा है। ग्रामीणों को अब भी तालाब और बोरवेल के जहरीले पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे बीमारी की श्रृंखला लगातार बढ़ रही है।

इलाज बना आर्थिक बोझ

किडनी फेल होने के बाद डायलिसिस ही एकमात्र विकल्प बचता है। सप्ताह में दो से तीन बार डायलिसिस कराने में हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले ग्रामीणों के लिए यह असहनीय आर्थिक बोझ बन चुका है।

प्रशासनिक उदासीनता पर उठे सवाल

ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने बार-बार प्रशासन और सरकार से स्थायी समाधान की मांग की, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिले। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते शुद्ध पेयजल, नियमित स्वास्थ्य जांच और बेहतर इलाज उपलब्ध कराया जाता, तो सैकड़ों जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।

ग्रामीणों की मांग: जीवन बचाने के लिए तुरंत कदम

ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि गांव में तत्काल सुरक्षित पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित की जाए एवं पानी शुद्धिकरण संयंत्र को शीघ्र शुरू किया जाए। नियमित किडनी जांच शिविर लगाए जाएं ताकि गंभीर रोगियों के लिए निःशुल्क इलाज और डायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराई जाए। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सुपेबेड़ा की यह त्रासदी एक बड़े मानवीय संकट में बदल सकती है।

 


 

इन्हें भी पढ़े

You cannot copy content of this page